History gurudwara Muktsar sahib@SH#EP=113

                     

                        

  

            इतिहास  गुरुद्वारा मुक्तसर साहिब

                                     

 मुक्तसर शहर पंजाब के 22 जिलों में एक जिला श्री मुक्तसर साहिब का मुख्यालय हैं। मुक्तसर शहर राजधानी चंडीगढ़ से 270 किमी, बठिंडा से 55 किमी यह ईलाका राजस्थान से सटा हुआ हैं, यहां पानी की कमी होती थी, लेकिन जिस जगह पर मुक्तसर साहिब का सरोवर हैं, यहां एक पानी की ढाब होती थी, जिसे खिदराणे की ढाब कहा जाता था, ढाब को हम तालाब भी बोल सकते हैं, कैसे इस खिदराणे की ढाब को साहिबे कमाल गुरू गोबिंद सिंह जी ने मुक्तसर साहिब बना दिया जो हम आगे पढेंगे। मुक्तसर साहिब का सरोवर पंजाब के गुरू द्वारों में दूसरा सबसे बड़ा सरोवर हैं, पहले नंबर पर तरनतारन साहिब का सरोवर हैं।
                                   इतिहास
 1704 ईसवीं में जब गुरू गोबिंद सिंह जी आनंदपुर साहिब में थे तो 6 महीने तक मुगलों और पहाड़ी राजों की सैना ने घेरा डाले रखा, इस समय गुरू जी के 40 सिख उनका साथ छोडकर कर अपने घर चले आए, गुरू जी ने कहा आप एक चिठ्ठी या बेदावा लिख कर जाओ कि मैं आपका गुरू नहीं हूँ, उन्होंने बेदावा लिख दिया और अपने घर पहुंच गए, इधर गुरू जी ने आनंदपुर साहिब का किला छोडकर मालवा की धरती पर भ्रमण करने लगे। जब वह 40 सिख गुरू जी से बेमुख होकर अपने घर पहुंचे तो उनकी बीवियों और भहनों ने उनको बहुत फटकार लगाई, बोली आप हाथों में चूडियां. डाल लो, गुरू जी का साथ छोड़ कर आ गए। माई भागो नाम की एक सिख शेरनी ने कमान संभाली और गुरू जी को मिलने के लिए सभी 40 सिखों को लेकर मालवा की यात्रा शुरु की, इधर गुरू जी भी खिदराणे की ढाब के पास थे, मुगल सैना उनका पीछा कर रही थी,

गुरू जी भी खिदराणे की ढाब पर मुगलों से युद्ध करना चाहते थे कयोंकि वहां पर पानी था, जब 40 सिखों को पता चला तो उन्होंने माई भागो जी की कमान में मुगल सैना से युद्ध किया, इस युद्ध में मुगल मैदान छोडकर भाग गए, 40 सिख भी शहीद हो गए, गुरू जी के जीवन का यह आखिरी युद्ध था, एक टिबे(ऊंचाई) पर गुरू जी सारा युद्ध देख रहे थे और तीर चला रहे थे, गुरू जी की जीत हुई, जब गुरू जी मैदान में आए तो 40 सिखों का सरदार महां सिंह सहक रहा था, गुरू जी ने उसका सिर अपने जाघ पर रख कर कहा बोल महासिंह कया चाहिए तुझे जिंदगी दे देता हूँ, महासिंह की आखों में पानी आ गया और बोला गुरू जी हमसे भूल हो गई हम बेदावा लिख कर आ गए, आप वह बेदावा फाड़ दो, दयालु गुरू महाराज ने अपनी जेब में से बेदावा निकाल कर फाड़ दिया, उसे फिर गुरू जी का पयार मिला, गुरू जी ने इन 40 सिखों को जन्म मरण के चक्कर से मुक्ति देकर मुक्त कर दिया और खिदराणे की ढाब को मुक्तसर साहिब बना दिया,  फिर अपने हाथों से सिखों का अंतिम संस्कार किया।

                          

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