History Kiratpur Sahib Punjab@SH#EP=117


                     इतिहास किरतपुर साहिब पंजाब

 कीरतपुर साहिब चंडीगढ़ मनाली हाईवे पर चंडीगढ़ से 80 किमी और जिला मुख्यालय रोपड़ से 31 किमी और एतहासिक  शहर आनंदपुर साहिब से 10 किमी दूर हैं। कीरतपुर साहिब में रेलवे स्टेशन भी हैं जो ऊना- नंगल- रोपड़- सरहिंद रेलवे लाईन पर बसा हुआ हैं।
 कीरतपुर साहिब के गुरुद्वारा शीश महल साहिब की जहां सिख धर्म के सातवें गुरु श्री हरिराय जी और उनके पुत्र बाला प्रीतम आठवें गुरुहरिकशन जी का जन्म हुआ। सतलुज नदी के किनारे और शिवालिक की पहाड़ियों के पैरों में बसे कीरतपुर साहिब को दस सिख गुरुओं में से 6 गुरुओं की चरनछोह प्राप्त हैं। यहां पहले गुरु नानक देव जी, छठें गुरु हरिगोबिन्द जी, सातवें गुरु हरिराय जी, आठवें गुरु हरिकिशन जी, नौवें गुरु तेगबहादुर जी और दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी पधारे हैं। कीरतपुर साहिब में दर्शन करने के लिए कुल 11 एतिहासिक गुरुद्वारे हैं। कीरतपुर साहिब को छठें गुरु हरिगोबिन्द जी ने बसाया, उन्होंने अपने आखिरी दस साल इस शहर में ही बिताए यहां ही वह जयोति जोत समाए। यहां ही उन्होंने अपने पौत्र गुरु हरराय  जी को गुरुगद्दी दी। यहां पर ही गुरुद्वारा पतालपुरी साहिब हैं जहां छठे गुरु हरिगोबिन्द जी का अंतिम संस्कार हुआ और पास में बहती हुई सतलुज नदी में उनकी असथियों को विसर्जन किया गया। आज भी सिख संगत यहां अपने बिछड़े हुए रिशतेदारों की असथियों को जल प्रवाह करने के लिए पतालपुरी साहिब लेकर आते हैं।यह एतिहासिक गुरुद्वारा शहर के बीचों बीच मौजूद हैं। इस जगह को कीरतपुर बसाते समय सबसे पहले तैयार किया गया।यहां पर ही छठें गुरु हरिगोबिन्द जी  ने निवास किया। यह उनका घर था। कीरतपुर साहिब के अपने निवास स्थान को गुरु हरिगोबिन्द जी ने शीश महल का रुप दिया, इसीलिए इस जगह को गुरुद्वारा शीश महल का नाम मिला। इसी जगह पर 1630 ईसवीं में सातवें सिख गुरु हरिराय जी का जन्म हुआ। यहां पर ही 1656 ईसवीं में आठवें गुरु हरिकिशन जी का जन्म हुआ। दस सिख गुरुओं के जन्म स्थान में से सात गुरु साहिब के जन्म भारतीय पंजाब में हुए। दो गुरु साहिब के जन्म पाकिस्तानी पंजाब में हुए और दसवें गुरु का जन्म बिहार की राजधानी पटना में हुआ।


गुरुद्वारा शीश महल में जब आप पुरातन डियूढ़ी से प्रवेश करोगे तो सामने आपको गुरुद्वारा साहिब की भव्य ईमारत दिखाई देगी, जिसके सामने लगे हुए अशोक के वृक्ष गुरुघर की शोभा को चार चांद लगा देते हैं। अंदर जाकर सामने गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश हैं और दरबार साहिब बिल्कुल शीश महल जैसा लगता हैं, जहां सुनहरी कलाकारी की हुई हैं। मन ऐसी पवित्र जगहों पर जाकर आनंदित हो जाता हैं और गुरू जी को याद करके नमन करने लग जाता हैं। गुरुद्वारा साहिब के आंगन में एक ऊंचा थड़ा बना हुआ हैं जहां बैठकर सातवें पातशाह हरिराय जी दीवान सजाया करते थे और संगत को उपदेश दिया करते थे, इस जगह को दमदमा साहिब कहते है।
                                                    

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