History Takht Sri Keshgarh Sahib@SH#EP=96

           

                        इतिहास तख्त श्री केशगढ़ आनंदपुर साहिब

                                                     By-janchetna.in


सिख धर्म के पांच पवित्र तख्तों में से एक तख्त श्री केशगढ़ साहिब  जो पंजाब के जिला रोपड़ में चंडीगढ़ से 90 किमी और रोपड़ से 45 किमी और कीरत पुर से 12 किमी दूर हैं। सिख इतिहास में आनंदपुर साहिब का बहुत महत्व है, यहां दर्शन करने के लिए बहुत एतिहासिक गुरुद्वारे और किले हैं। आनंदपुर साहिब को नौवें पातशाह गुरु तेग बहादुर जी ने कहलूर रियासत ( बिलासपुर) के राजा से जमीन खरीद कर बसाया था।
केशगढ़ साहिब एक ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है। इसी जगह पर साहिबे कमाल कलगीधर पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 ईसवीं की बैशाखी पर खालसा पंथ की सथापना की। आज केशगढ़ साहिब सिख धर्म के पांच सबसे महत्वपूर्ण गुरुद्वारों में से एक हैं। 1699 ईसवीं की बैशाखी को एक भारी इकट्ठ को संबोधित करते हुए गुरु गोबिंद सिंह जी ने एक शीश की मांग की जो जुल्म के खिलाफ लड़ सके, एक एक करके पांच शिष्य आगे आकर  अपने शीश गुरु जी को देने के लिए आगे बढ़े। बाद में यहीं पांच शिष्य गुरु जी के पांच पयारे बने। जिनके नाम निम्नलिखित हैं…
भाई धरम सिंह
भाई दया सिंह
भाई मोहकम सिंह
भाई हिम्मत सिंह
भाई साहिब सिंह
गुरु जी ने इन पांच शिष्यों को अमृत छकाया और खालसा पंथ की सथापना की। आज भी देश विदेश से श्रद्धालु केशगढ़ साहिब में माथा टेकने आते हैं। केशगढ़ साहिब की ईमारत बहुत शानदार और विशाल हैं। केशगढ़ साहिब गुरु जी का एक किला भी था, दूर से देखने पर आपको सफेद रंग के किले के रूप में दिखाई देगी केशगढ़ साहिब की ईमारत। केशगढ़ साहिब के अंदर गुरु ग्रंथ साहिब जी एक सुंदर पालकी में बिराजमान हैं। वहीं अंदर दरबार में गुरु जी के बहुत सारे एतिहासिक शस्त्र भी संगत के दर्शनों के लिए रखे हुए हैं, जैसे खंडा, कटार, सैफ, बंदूक,नागिनी बरछा आदि। इसके साथ गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के पवित्र केश और एक कंघा भी रखा हुआ है। यहां पर रहने की और लंगर की उचित वयवस्था हैं। जब भी आप पंजाब घूमने आए तो इस एतिहासिक धरती को नमन करने आनंदपुर साहिब जरूर आना

 खालसा का जन्मस्थान होने के कारण केशगढ़ साहिब में कई ऐतिहासिक कलाकृतियाँ प्रदर्शित हैं जो मूल रूप से गुरु गोबिंद सिंह की थीं। आनंदपुर अपने आप में एक सुंदर शहर है जो शिवालिक पर्वत श्रृंखला के तल पर स्थित है, जिसके चारों ओर चैती रंग की सतलुज बहती है। गुरुद्वारा साल भर लोगों संगत से गुलजार रहता है। गुरुद्वारा थोड़ा ऊपर की ओर स्थित है, जहां से ऊपर से शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यहां दर्शन करने के लिए दूसरी सबसे अच्छी बात विरासत-ए-खालसा संग्रहालय का दौरा करना है जो गुरुद्वारे से पैदल चलने योग्य दूरी पर है। यह संग्रहालय अवश्य देखना चाहिए क्योंकि इसमें न केवल सिख धर्म का पूरा इतिहास है, बल्कि यह भी बताया गया है कि पंजाब आज किस रूप में विकसित हुआ है। आपको संग्रहालय के लिए कम से कम 4 से 5 घंटे और गुरुद्वारे के लिए कुछ घंटों की आवश्यकता होगी।

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